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मनी लांडरिंग और आतंकी संगठनों के वित्त पोषण जैसी गतिविधियों पर लगाम लगाने में असमर्थ रहने के चलते इस

पाकिस्‍तान की चरमराई अर्थव्‍यवस्‍था की कमर तोड़ सकता है FATF का फैसला

नई दिल्‍ली (स्‍पेशल डेस्‍क)। एक तो करेला दूसरे नीम चढ़ा। पहले से ही आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर खस्ताहाल पाकिस्तान की अपने कर्मों के चलते दुश्वारियां बढ़ गई हैं। मनी लांडरिंग और आतंकी संगठनों के वित्त पोषण जैसी गतिविधियों पर लगाम लगाने में असमर्थ रहने के चलते इसे फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे सूची में डाल दिया गया है। इससे पाकिस्तान में गंभीर वित्तीय संकट खड़ा हो सकता है। अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। दूसरों से कर्ज लेकर घी पीने वाले इस पड़ोसी को ऋण मिलना कठिन हो सकता है। देश में कारोबार करना महंगा हो सकता है। मुश्किलों की फेहरिस्त लंबी है। चंद महीने बाद होने जा रहे आम चुनावों से ठीक पहले उठने वाला यह कठोर वैश्विक कदम पाकिस्तान के लिए ठीक संकेत नहीं है।

पाक मीडिया ने कोसा 
पाकिस्तान को खुद अपने ही देश की मीडिया की आलोचना झेलनी पड़ रही है। पाकिस्तानी अखबारों में छपे संपादकीयों में कहा गया है कि संदिग्धों की सूची में जाने के लिए कोई और नहीं बल्कि खुद पाकिस्तान ही जिम्मेदार है। इन लेखों में कहा गया है कि अगर देश में आतंकी खुलेआम घूमे, संगठित हों, फंड जुटाएं और चुनावी प्रक्रिया में शामिल हो जाएं तो ग्रे लिस्ट में शामिल होने की ही आशा रहती है। पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार डॉन के संपदाकीय में इसके पीछे भारत को एक बड़ी वजह बनाया गया है। इसके अलावा द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के संपादकीय में कहा गया है, 'यह भारत या अमेरिका का कोई छिपा प्लान नहीं है बल्कि बड़ी संख्या में दुनियाभर के देश यही मानते हैं...FATF के सदस्यों देशों के पास सूचना का अपना स्रोत है और वे पाकिस्तान को अपने लिए भरोसेमंद नहीं मानते हैं। इसके अलावा द नेशन का कहना है कि यह पूरी तरह से पाकिस्‍तान की ही गलती है। इसके अलावा अखबार ने पाक सरकार को जिम्‍मेदार ठहराया है।

सूचियों की बानगी
एफएटीएफ दुनिया के उन देशों की दो सूची बनाती है जो मनी लांर्डंरग और आतंकी संगठनों को मिलने वाले धन को रोकने या उसके खिलाफ कदम उठाने में पीछे रहते हैं। इस आशय की पहली सूची ग्रे और दूसरी ब्लैक होती है।

क्या है एफएटीएफ
जी-7 देशों की पहल पर 1989 में गठित एक अंतर सरकारी संगठन है। गठन के समय इसके सदस्य देशों की संख्या 16 थी। 2016 में ये संख्या बढ़कर 37 हो गई। भारत भी इस संस्था का सदस्य देश है। शुरुआत में इसका मकसद मनी लांर्डंरग पर रोक लगाना था, लेकिन 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकी हमलों के बाद आतंकी संगठनों का वित्त पोषण भी इसकी निगरानी के दायरे में आ गया।

गंभीर प्रतिकूल असर
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक सहित वैश्विक वित्तीय संस्थाएं इस देश की साख को गिरा सकती हैं। इससे इसे कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा। 
- मूडी, एस एंड पी और फिच जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां देश की रेटिंग गिरा सकती हैं। इससे इसकी अर्थव्यवस्था डावांडोल हो सकती है। निवेशक बिदक सकते हैं।
- देश का शेयर बाजार लुढ़क सकता है। वित्तीय अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो सकती है। चीन इस आर्थिक स्थिति का फायदा ज्यादा से ज्यादा निवेश करके उठा सकता है।
- वहां का वित्तीय क्षेत्र ढह सकता है। 126 शाखाओं वाला सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय बैंक स्टैंडर्ड चार्टर्ड सहित सिटी बैंक, ड्यूश बैंक अपना कारोबार समेट सकते हैं।
- विदेशी लेनदेन और विदेशी मुद्रा प्रवाह में कमी के चलते पहले से ही सिर से ऊपर चढ़ा पाकिस्तान का चालू खाता घाटा और बढ़ सकता है।
- विदेशी निवेशकों और कंपनियों को यहां कारोबार करने से पहले हजार बार सोचना पड़ सकता है। लिहाजा विदेशी निवेश के नाम पर धेला न मिलने के लिए भी इस देश को तैयार रहना होगा।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार से फंड के इंतजाम करने में इस्लामाबाद को नाको चने चबाने पड़ सकते हैं। 
- पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ साल से पांच फीसद की दर से बढ़ रही है। इस साल सरकार का लक्ष्य इसे छह फीसद ले जाने का था। ग्रे सूची में डालने से उसके मंसूबे पर कुठाराघात होगा।
- यूरोपीय देशों को निर्यात किए जाने वाले चावल, कॉटन, मार्बल, कपड़े और प्याज सहित कई उत्पादों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। लिहाजा घरेलू उत्पादकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

Input:  जागरण