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समाज से आपराधिक प्रवृत्ति मिटाने का रास्ता संस्कारों के रास्ते नैतिकता, मानवता के साथ मिलकर सच्चा मा

संस्कृति, संस्कार और सभ्यता की कुंजी ही है मानव जीवन के अस्तित्व की कुंजी

संस्कृति, संस्कार और सभ्यता ''यही है लोक जीवन में सुकून का आधार''

- अंर्तमुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज

संसार में मानव के रूप में जन्म लेना एक अलग बात है और मानव होना अलग बात। मनुष्य योनि प्राप्त कर लेने मात्र से कोई मानव नहीं कहा जा सकता। मानव होने के लिए परंपरागत मानवीय मूल्यों का होना जरूरी है और ये जीवन मूल्य उसे अपनी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की त्रिवेणी से प्राप्त होते हैं। इनके अवलंबन से ही मनुष्य शरीर धारी कोई भी व्यक्ति मानव बन सकता है। इस त्रिवेणी का ज्ञान एवं आत्मतत्व के सात एकाकार हो तो वह मानव स्वयं को परमात्मा बता लेता है। मात्र लौकिक ज्ञान के बूते मानव विकास संभव नहीं है। संपूर्णता के साथ इस ज्ञान को आत्मसात करने वाला व्यक्ति मनुष्य के रूप में जिस कर्मयोग को अपनाता है उसमें आशातीत सफलता और यश कीर्ति सहज ही प्राप्त हो सकती है। वास्तव में मावन की सही पहचान उसके संस्कारों, सभ्यता और संस्कृति से ही होती है। भारतीय संस्कृति और संस्कारों के प्रति आस्था, समर्पण और श्रद्धा का भाव जितना प्रगाढ़ होगा उतना ही वह मानव आत्म संतोष और परमानंद को प्राप्त करेगा। इस मूलाधार को अपनाकर अनेक आत्माओं ने चेतना का विकास कर आत्मसाक्षात्कार पाया और दुनिया वह अनुपम ज्ञान प्रदान किया है जिसे ह्रदयंगम करने परन कोई शंका, न आशंका और ना ही कोई जिज्ञासा शेष रहती है। ऐसी जीवात्मा मनुष्य रूप में पूर्णत्व को प्राप्त कर पुण्यात्मा हो जाती है, जो कालान्तर में अपनी साधना से मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त करती है।

 

मानव जीवन में संस्कार व संस्कृति से ज्ञान का क्षयोपशम बढ़ता है। विवेक जागृत होता है और सही गलत की पहचान होती है। मात्र ज्ञान व्यक्ति के भीतर वासनाएं उत्पन्न करता है। यही वासनाएं मानव को विनाश की ओर ले जाती हैं और जो ज्ञान विनाश की ओर ले जाए वह ज्ञान कैसे हो सकता है? क्योंकि वास्तविक, विवेकी और संपूर्ण ज्ञान तो व्यक्ति, समाज, परिवार और देश का विकास ही करता है। व्यक्ति जिस देश, समाज व परिवार में जन्म लेता है उसी के अनुरूप व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का बीजारोपण होना चाहिए पर आज ऐसा नहीं हो रहा है क्योंकि लौकिक ज्ञान के साथ हम युवा पीढ़ी को संस्कृति का पाठ नहीं पढ़ा रहे हैं। हम हमारी पुरातन संस्कृति, सभ्यता के आदर्शों और परंपराओं की जड़ों से निरन्तर कटते जा रहे हैं और इनमें हमारी दूरी दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने हमारे संस्कारों का नाश कर दिया है, इसलिए आज ऐसी घटनाओं का ग्राफ बढ़ता जा रहा है जिसमें मनुष्यता का ह्रास साफ दिखाई देता है। यही नहीं मानवीयता की हदों को पार करती ऐसी घटनाएं दुर्भाग्यवश हमारे आसपास से लेकर देश दुनिया में घट रही हैं जिनकी कल्पना हम सपने में भी नहीं कर सकते हैं।

इन घटनाओं को जन्म देने का दोषी कौन है ? क्यों घट रही हैं ये घृणित घटनाएं? कैसे इन घटनाओं पर रोक लगा सकते हैं?

ऐसे कितना ही यक्ष प्रश्न हमारे सामने मुंह बाएं खड़े हैं। जिनका अगर जवाब मिल जाए तो ऐसी घटनाओं पर सदा के लिए रोक लगा सकते हैं। पर क्या... मात्र एक घटना के दोषी को सजा मिल जाने से सभी दोषियों को सजा मिल जाएगी? या सबक मिलेगा? क्या हमारी संस्कृति और संस्कार बच सकते हैं? क्या हमारी दम तोड़ती सभ्यता को जीवनदान मिल सकता है? क्या जिसके साथ यह घटना घटी है वह अपनी मानसिक और भावनात्मक पीड़ा से उभर सकती है?

इन सब प्रश्नों पर गंभीरता से सोचना होगा। अगर हम इन घटनाओं को रोकना और इन प्रश्नों का सही और स्थायी हल चाहते हैं तो सब से पहले हमें स्वयं को, हमारे परिवार की और समाज को संकल्प लेना होगा कि हम हमारी सभ्यता, संस्कृति के संरक्षण हेतु बच्चों में संस्कारों का पोषण करेंगे। अपने बच्चों को मर्यादा में रहने का पाठ पढ़ाएंगे। उनकी मानसिक और आध्यात्मिक चेतना का विकास करेंगे। संतों को भी चाहिए कि वे अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज में इस तरह का वातावरण उत्पन्न करें कि हर व्यक्ति संस्कृति और सभ्यता के नीति नियमों को जीवन में आत्मसात कर ले। हर गांव शहर में संस्कार शिविर व संस्कार महोत्सव का आयोजन कर उसमें बच्चों बड़ों सभी को संस्कारों से पोषित करना चाहिए। सामाजिक संस्थानों को आगे आकर प्रदर्शन करने से अधिक समाज परिवार में सभ्य संतुलित माहौल उत्पन्न करने के लिए सक्रिय सहभागिता देना चाहिए। उन्हें सामाजिक नवनिर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभानी होगी और अपनी धाराओं को बदलकर पूरी शक्ति लोक जागररण तथा लोक शिक्षा में लगाना होगी। मर्यादा का पाठ चाहे वह लड़का हो या लड़की सभी को परिवार में निष्पक्ष रूप से पढ़ाना होगा। लोगों से यह संकल्प पत्र भरवाना होगा कि ये वे अपने समाज और परिवार की मर्यादा का पालन करेंगे और देश, समाज, परिवार को संस्कृति के अनुरूप ढालकर जीवन में संस्कारों का बीजारोपण करेंगे। हमें समझना होगा कि खेत में अनाज बोया हो और उसकी सुरक्षा में बाड़ का अभाव हो तो पशु उस फसल को नष्ट कर देते हैं। हम पशु को भगाने के पहले खेत में चारों ओर बाड लगा लें तो हमारी फसल बच जाएगी व हमें पशु के पीछे भागने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी।

समाज व परिवार में सबसे पहले खान पान की मर्यादा साधना होगी तभी हमारी संस्कृति और संस्कार सुरक्षित रह सकते हैं। जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन। हमारा खान पान ही हमारी सोच को विकृत करता है और सात्विक भी करता है। जब तक यह सोच विकसित नहीं होगी तब तक वासनाओं पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं है। खान पान से ही संस्कृति और संस्कार का पता चल जाता है कि देश, समाज, परिवार व व्यक्ति का जीवन व्यवहार कैसा है। हमारी जीवन शैली, खानपान और व्यवहार सबकुछ बदलकर कृत्रिम होता जा रहा है। हमें जो नहीं करना चाहिए, वह सारे काम हम करने लगे हैं। खान पान, रहन सहन, मान मर्यादा, व्यवहार, चाल चलन और चरित्र सबकुछ तो हम भूलते जा रहे हैं। हमें जीवन में हर पल संस्कारों को पोषित करने की आवश्यकता है और संस्कार केवल और केवल माता पिता द्वारा ही संतान के मिलते हैं। संतान से आनेवाली संतति को फिर इसी तरह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं। परिवार से समाज, समाज से देश और देश से राष्ट्र को विकसित करने के लिए कहीं न कहीं से छोटी पहल जरूरी है। जो हमारे विवेक को जागृत कर ज्ञन के सदुपयोग और सदाचरण हेतु सभी को प्रेरित करे। शिक्षा के बहाने हम समय के साथ चलने के नाम पर पुत्र और पुत्रियों में अंतर को समाप्त करते जा रहे हैं। पर भूल रहे हैं कि प्रकृति जन्य भेद तो सदा ही बना रहेगा।

भारतीय संस्कृति में पुत्री को देवी स्वरूप माना गया है। इस देवी का भाव और उसके प्रति आदर हम खोते जा रहे हैं। देवी की शोभा मंदिर में ही है और मंदिर के बाहर वह धर्म की रक्षा के लिए ही आती है। इसलिए पुत्रियों को अपने दैवी स्वरूप को बनाए रखने के लिए मर्यादा में रहकर ही सारे कार्य करना चाहिए। जिससे की उनकी पवित्रता बनी रहे। शिक्षा के नाम पर संस्कृति, संस्कारों और मर्यादाओं को त्यागने के स्थआन पर उनका पूरा-पूरा पालन किया जाए और परंपरागत जीवन मूल्यों को बिना भूले उन्हें जीवन में आत्मसात किया जाए तो ऐसी घटनाओं का बीज पनपेगा ही नहीं। इन घटनाओं का वास्तविक दोषी कौन है? अगर गहराई से जानने का प्रयास करेंगे तो जानेंगे कि हम, हमारी लापरवाही और नजरअंदाज करने की आदत ही है जो हमारी आंखें मूंदे हुए है। क्यों हम बच्चों को मर्यादा में नहीं बांध पा रहे है? क्यों हम अपना फर्ज सही ढंग से नहीं निभा पा रहे हैं? जब कभी हमें अपने कर्तव्य की याद दिलाई जाती है तब तब हम यह कह कर जिम्मेदारी से दूर भागते हैं कि क्या करें, समय ही ऐसा आ गया है। बच्चों को समय के साथ न चलने दें तो क्या करें? बच्चों को डरकर घर में बैठकर रख तो नहीं सकते ना? क्या ऐसा कहना सही है? क्या हम इस तरह का जवाब देकर लापरवाही नहीं कर रहे? वास्तविकता में हम ही इन घटनाओं के दोषी हैं। थोड़ी सी गंभीरता के साथ सोचें तो हमें अपने आप यह भान हो जाएगा कि हम, हमारा परिवार और हमारा समाज ही जिम्मेदार है। हमारी आत्म अनुशासन, मर्यादाएं, सीमा रेखाएं, सामाजिक व्यवस्थाओं और अंकुछ की परिधियां हमने तोड़ दी और स्वतंत्रता को स्वच्छंदता मानकर संस्कारों और संस्कृतिके गुणों को खोते जा रहे हैं। जिन मूल्यों में मानव समाज को बांधे रखने का असीम सामर्थ्य है उन्हें हम धीरे धीरे छोड़ते जा रहे हैं। आज समय पुकार रहा है।

इन घटनाओं को रोकने के लिए। वक्त कि मांग है समाज में संस्कृति और संस्कारों भरे नैतिक मूल्यों और आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए एक अभियान चलाने की संस्कृति बचाओ अभिया। जिसे कोई संस्था, समाज या संगठन न चलाकर अगर हर व्यक्ति अपने स्तर पर चलाएगा तो यह एक महाअभियान बन जाएगा और तभी इन घटनाओं पर अंकुश लग सकता है। अन्यथा हम कब तक इस प्रकार सड़कों पर उतर कर इंसाफ मांगते रहेंगे? इंसाफ तभी मिलेगा जब कानून चाहेगा। कानून तो कानून है जिस काम के लिए जो सजा है वही मिलेगी पर पीड़ित मानव को क्या मिलेगा? जिसका सबकुछ खत्म हो गया। उसका ख्याल कौन रखेगा? उन पीड़ितों को अपनाने के लिए फिर एक संस्थान की स्थापना भी साथ ही जरूरी है। जो इन्हें आश्रय दे और संबल दे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर कब तक ये सब चलता रहेगा? क्या इन सब प्रदर्शनों से इस प्रकार की घटनाएं कम हो पाएंगी? यह सब इस समस्या के स्थायी हम नहीं है। बिना किसी स्थायी समाधान के हम समाज के मूल से अपराधिक मानसिकता वाले लोगों का नाश नहीं कर पाएंगे। क्योंकि एक अपराधी को सजा मिलेगी तो दूसरा अपराधी खड़ा हो जाएगा।

यदि हम लोगों को मानसिकता से ही अपराधिकता का नामोनिशान मिटाना सकेंगे तो अपराध समूल नष्ट हो जाएंगे। जब इंसान के पास केवल नैतिकता रह जाएगी तो वह मानवीयता के साथ जुड़कर एक सच्चा मानव इस समाज को देगी। आपराधिक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना है और इस तरह की घटनाओं को रोकना है तो मन के भटकाव को रोक लौकिकता से निकल कर पारलौकिक आध्यात्मिक और चैतन्य सोच को अपनाना होगा। जीवन शैली को आधुनिक करने की होड़ छोड़कर उच्च संस्कारी संयमित जीवन शैली को अपनाना होगा। सही मायने में जरूरत इस बात की है कि समाज और परिवार अफनी जिम्मेदारी का एहसास करे और मानव जीवन की उस बुनियाद को मजबूत करे जो संस्कृति और संस्कारों पर टिकी हुई है। इसके लिए सर्वत्र प्रभावी माहौल बनाने की दिशा में हमें जुटना होगा। तभी समाज से अपराध और अपराधी दोनों खत्म हो सकते हैं। आज हम सभी को संकल्प लेना होगा कि हम संस्कृति संरक्षण और प्रचार प्रसार के अभिनव अभियान में भागिदार बनें और समाज को बुराइयों से मुक्त कराते हुए ऐसा बदलाव लाएं जहां सभी लोग निर्भय होकर जीवन सुकून पा सकें।